हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
आज सोशल मीडिया पर देखा कि बहुत लोग हिन्दी हिन्दी खेल रहे हैं! हमारे समझ में नहीं आता कि आखिर कैसे लोग भाषाओं के प्रति भी इस प्रकार दुराग्रह रख सकते हैं जोकि केवल संवाद का माध्यम मात्र हैं। केवल अपनी भावनाओं को दूसरे तक संप्रेषित करने का एक साधन! इससे अधिक भाषाओं की कोई उपयोगिता हमे समझ नहीं आती! परन्तु जिन्हें समस्या खड़ी करनी है वो इसके साथ भी मेरी और तेरी और ऊपर से गर्व भी जोड़कर ऐसा मसाला प्रस्तुत करेंगे कि एक मासूम सी भाषा भी नफरत की चाट बन जाए। हिन्दी वाले अंग्रेजी को पसन्द नहीं करते और दक्षिण वाले हिन्दी से नफरत करते हैं। भले ही लिपि एक ही हो परन्तु मराठियों की सारी अस्मिता उनकी भाषा से जुड़ी है। माफ़ करना थोड़े कड़े शब्द हैं परन्तु हम भी अपने स्वभाव के अनुसार सत्य कहने को मजबूर है कि इन भाषा प्रेमियों ने वाकई भाषाई नफरत को पाला-पोसा है!
भाषा के प्रति कट्टरता की हद तक शुद्धता का आग्रह हमे वस्तुतः दुराग्रह नजर आता है। इस भाषाई शुद्धता और जातिय शुद्धता (रक्त शुद्धि) में हमे कोई अन्तर नजर नहीं आता। और इस प्रकार का दुराग्रह भी जातिय अथवा भाषाई नफरत ही पैदा करता है। यूरोपियन देशों में सबकी अपनी-अपनी मातृभाषा है और वहाँ उच्च शिक्षा भी इनकी मातृभाषा में ही होती है। हम हिन्दी में मेडिकल, इंजीनियरिंग और विज्ञान क्यों नहीं पढ़ाते? क्यों नहीं हिन्दी में इतना काम किया हमने? केवल अंग्रेजी को कोसने से क्या होगा! निश्चित ही कोई भी किसी भाषा के जानने अथवा न जानने से बुद्धिमान या मूर्ख नहीं होता फिर केवल अपनी भाषा की शुद्धता के प्रति हमारी कट्टरता क्यों होती है?भाषा को भी धर्म (सम्प्रदाय) की तरह बनाकर बाँट दिया हमने इन्सान को! याद रखिये इसमें नुक्सान हमारा है और हमारी भाषा का।
वहाँ यूरोप में जर्मनी, फ़्रांस, स्पेन, डेनमार्क, स्वीडन, इटली, पुर्तगाल आदि छोटे-छोटे देश हैं, सबकी अपनी अपनी भाषा है परन्तु किसी को किसी की भाषा से कोई समस्या नहीं, कोई नफरत नहीं! बल्कि स्कूल के स्तर पर ही विद्यार्थी एक से अधिक भाषाएं सीखने और बोलने का प्रयास करते हैं और अपनी मातृभाषा को बोलकर नहीं बल्कि अन्य भाषाओं को बोलकर गर्व का अनुभव करते हैं। अपने देश भारत के सन्दर्भ में इस समस्या को देखा जाए तो हम बहुत धन्यवाद देते है अंग्रेजी का कि यदि हम दक्षिण भारत जाए तो कम से कम अंग्रेजी में संवाद तो कर सकते है। नहीं तो अपने ही देश में हम एक दूसरे की भाषा नहीं समझते। अब क्या हम तमिल, तेलगु या कन्नड़ भाषी को जबरदस्ती हिन्दी सिखायेंगे कि हिन्दी तो राष्ट्रभाषा (माना गया है वास्तविकता में भारत की अभी तक कोई भी राष्ट्रभाषा नही है) है क्योंकि वो सबसे बड़े हिस्से में बोली जाती है। ठीक यही बात हिन्दी वालों पर अंग्रेजी लादने वालों के लिए भी कही जा सकती है परन्तु उसके पहले यह बताइये कि क्या हमने आधुनिक शिक्षा को हिन्दी में विकसित किया? क्या हमारे देश में मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई हिन्दी में होती है? परन्तु वहाँ यूरोप जर्मनी, फ़्रांस, स्पेन इत्यादि में उच्च शिक्षा भी वहाँ की मातृभाषा में होती है।
जब हमने अपनी भाषा को आधुनिक समय के साथ इतना विकसित नहीं किया तो फिर क्यों दोष देते हैं और नफरत के बीज बोते हैं भाषाई दुराग्रह को पालकर। आखिर क्यों नहीं कोई गरीब भी अंग्रेजी पढ़कर समय के साथ चलने और स्वयं का विकास करने का सपना देखे। यही बात संस्कृत के लिए भी हम कह सकते है। बल्कि किसी समय में संस्कृत के प्रति भी लोगों का ऐसा नजरिया था जैसा कि आज हिन्दी के प्रति बहुत से लोगों का है। बहुत हाय तौबा मचाते होंगे उस समय वो लोग कि संस्कृत को छोड़कर अब लोग हिन्दी का प्रयोग करते हैं, बड़ी शर्म आती होगी उन्हें। संस्कृत तो बीत ली और आज की स्थिति यह है कि हिन्दी भी कविताओं, कहानियों और आम बोल-चाल की भाषा रह गई है। बताइये किस स्तर पर विज्ञान की पढाई हिन्दी में होती है! और हिन्दी में पढ़ाई करने बाद किस स्तर पर भविष्य के दरवाजे खुले मिलते हैं?
पता नहीं क्यों भाषा प्रेमी इसे अस्मिता, गर्व का विषय बनाकर भाषाई नफरत के बीज बो रहे हैं। अरे सच्चाई को स्वीकार करें या तो अपनी भाषा को उस काबिल बनायें और नहीं तो खुद को और अपने बच्चों को उस काबिल बनायें कि तरक्की के रास्ते उनके लिए खुले रहें। ऐसे भाषा प्रेम को चाटेंगे क्या जिससे कि दो वक्त की रोटी भी सुख से न मिले। हम भी हिन्दी को प्रेम करते है परन्तु अंग्रेजी का दिया खाते है और हम ऐसे अकेले ही नहीं है, बहुत सारे लोग यह बात अपने विषय में कह सकते हैं। और हां हिन्दी की पैरवी करने वाले बहुत से उन लोगों को भी हम जानते है जो हिन्दी भाषा के लिए भाषण तो बहुत बढ़िया देते हैं परन्तु अपने बच्चों को शिक्षा महंगे अंग्रेजी स्कूलों में ही दिलाते हैं।
हम हिन्द में जन्मे है, हिंदी हमारी मात्र भाषा है इसलिए हिंदी को ही प्राथमिकता देते है। इसकी वजह भी है। दरअसल हमारी सोच का माध्यम हिंदी है। हमारी खुशी, गुस्सा और सपने सभी हिंदी में ही होते हैं। लेकिन जहां अंग्रेजी में बोलने, पढ़ने व लिखने की जरुरत होती है वहां हम अंग्रेजी का ही प्रयोग करते है इसलिए हमारे लिए भाषा केवल संवाद का माध्यम है न कि कोई गर्व का विषय। यह संयोग है कि हिन्दी हमारी मातृभाषा है और यदि हम कहीं और पैदा हुए होते तो हमारी भाषा कोई और होती। हमारे पैदा होने पर हमारा कोई वश नहीं था वह मात्र एक संयोग था और माफ़ कीजियेगा हम जाति, भाषा इत्यादि के संयोंगो पर गर्व नहीं करते। भाषा, जाति यह सभी संयोग मात्र हैं और गर्व का विषय नहीं हैं। गर्व उपलब्धियों पर करना चाहिए न कि संयोगों पर। हमे भी अपनी भाषा से प्रेम है जोकि स्वाभाविक है परन्तु हम ऐसे भाषा प्रेमी नहीं कि उसके प्रति दुराग्रह हो।
जय भारत



