Wednesday, January 13, 2021

मकर संक्रांति (त्यौहार एक नाम अनेक)

 


मकर संक्रांति एक ऐसा त्यौहार है, जिसे देश के हर कोने में मनाया जाता है। कहीं पर लोहड़ी तो कहीं इसे खिचड़ी के नाम से जाना जाता है। कई नामों वाले इस त्योहार को जगह-जगह मनाने का ढंग भी अलग है। आइये जानते हैं, क्या है इस त्यौहार की खासियत और देश के किस हिस्से में कैसे मनाते हैं।

हरियाणा और पंजाब में मकर संक्रांति लोहड़ी के रूप में मनाई जाती है। यह त्यौहार 14 जनवरी के स्थान पर 13 जनवरी को रात में मनाया जाता है। अंधेरा होते ही आग जलाकर अग्निदेव की पूजा करते हुए तिल, गुड़, चावल और भुने हुए मक्के की आहुति दी जाती है। इस सामग्री को तिलचौली कहा जाता है। इस अवसर पर लोग मूंगफली, तिल की बनी हुई गजक और रेवड़ियां आपस में बांटकर खुशियां मनाते हैं। बहुएं घर-घर जाकर लोकगीत गाकर लोहड़ी मांगती हैं। नई बहू और नवजात बच्चे के लिये लोहड़ी का विशेष महत्व होता है।

उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति को दान पर्व के रूप में जानते हैं। इस दिन दान के साथ ही इलाहाबाद, गंगा, यमुना, सरस्वती के संगम पर माघ मेला लगता है। यहां स्नान करने का अपना अलग ही महत्त्व है। इलाहाबाद में हर साल माघ मेले की शुरुआत होती है। 14  दिसम्बर से 14  जनवरी तक का समय खर मास के नाम से जाना जाता है।

बिहार में मकर संक्रान्ति को खिचड़ी नाम से जाता हैं। इस दिन उड़द, चावल, तिल, चिवड़ा, गौ, स्वर्ण, ऊनी वस्त्र, कम्बल आदि दान करने का अपना महत्त्व है।

महाराष्ट्र में इस दिन सभी विवाहित महिलाएं अपनी पहली संक्रान्ति पर कपास, तेल व नमक आदि चीजें अन्य सुहागिन महिलाओं को दान करती हैं। तिल-गूल नामक हलवे के बांटने की प्रथा भी है। लोग एक दूसरे को तिल गुड़ देते हैं और देते समय बोलते हैं तिल गुड़ लो और मीठा-मीठा बोलो । इस दिन महिलाएं आपस में तिल, गुड़, रोली और हल्दी बांटती हैं।

बंगाल में इस पर्व पर स्नान के बाद तिल दान किया जाता है। यहां गंगा सागर में नहाने की प्रथा है।
गंगा सागर में प्रति वर्ष विशाल मेला लगता है। मकर संक्रान्ति के दिन ही गंगा जी भगीरथ के पीछे  कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं। मान्यता यह भी है कि इस दिन यशोदा ने श्रीकृष्ण को प्राप्त करने के लिये व्रत किया था। इस दिन गंगासागर में स्नान-दान के लिये लाखों लोगों की भीड़ होती है। लोग कष्ट उठाकर गंगा सागर की यात्रा करते हैं।

तमिलनाडु में इस त्योहार को पोंगल के रूप में चार दिन तक मनाते हैं। प्रथम दिन भोगी-पोंगल, द्वितीय दिन सूर्य-पोंगल, तृतीय दिन मट्टू-पोंगल अथवा केनू-पोंगल और चौथे व अन्तिम दिन कन्या-पोंगल। इस प्रकार पहले दिन कूड़ा करकट इकठ्ठा कर जलाया जाता है। दूसरे दिन लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है और तीसरे दिन पशु धन की पूजा की जाती है। पोंगल मनाने के लिये स्नान करके खुले आंगन में मिट्टी के बर्तन में खीर बनायी जाती है, जिसे पोंगल कहते हैं। इसके बाद सूर्य देव को नैवैद्य चढ़ाया जाता है। उसके बाद खीर को प्रसाद के रूप में सभी ग्रहण करते हैं। इस दिन बेटी और जमाई राजा का विशेष रूप से स्वागत किया जाता है।

असम में मकर संक्रान्ति को माघ बिहू के नाम से जानते हैं। इसके अलावा भोगाली भीहु भी इस त्यौहार का नाम है।

राजस्थान में सुहागिनों के है ये त्यौहाा र

राजस्थान में इस पर्व पर सुहागन ,महिलाएं अपनी सास को वायना देकर आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। साथ ही महिलाएं किसी भी सौभाग्यसूचक वस्तु का चौदह की संख्या में पूजन एवं संकल्प कर चौदह ब्राह्मणों को दान देती हैं। इस प्रकार मकर संक्रान्ति के माध्यम से भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की झलक विविध रूपों में दिखती है।

Sunday, November 1, 2020

हरियाणा दिवस

 


हरियाणा उत्तर भारत का एक राज्य है जिसकी राजधानी चण्डीगढ़ है। इसकी सीमायें उत्तर में पंजाब और हिमाचल प्रदेश, दक्षिण एवं पश्चिम में राजस्थान से जुड़ी हुई हैं। यमुना नदी इसके उत्तर प्रदेश राज्य के साथ पूर्वी सीमा को परिभाषित करती है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली हरियाणा से तीन ओर से घिरी हुई है और फलस्वरूप हरियाणा का दक्षिणी क्षेत्र नियोजित विकास के उद्देश्य से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में शामिल है।

यह राज्य वैदिक सभ्यता और सिंधु घाटी सभ्यता का मुख्य निवास स्थान है। इस क्षेत्र में विभिन्न निर्णायक लड़ाइयाँ भी हुई हैं जिसमें भारत का अधिकत्तर इतिहास समाहित है। इसमें महाभारत का महाकाव्य युद्ध भी शामिल है। हिन्दू मतों के अनुसार महाभारत का युद्ध कुरुक्षेत्र में हुआ (इसमें भगवान कृष्ण ने भागवत गीता का वादन किया)। इसके अलावा यहाँ तीन पानीपत की लड़ाइयाँ हुई। ब्रितानी भारत में हरियाणा पंजाब राज्य का अंग था जिसे १९६६ में भारत के १७वें राज्य के रूप में पहचान मिली। वर्तमान में खाद्यान और दुग्ध उत्पादन में हरियाणा देश में प्रमुख राज्य है। इस राज्य के निवासियों का प्रमुख व्यवसाय कृषि है। समतल कृषि भूमि निमज्जक कुओं (समर्सिबल पंप) और नहर से सिंचित की जाती है। १९६० के दशक की हरित क्रान्ति में हरियाणा का भारी योगदान रहा जिससे देश खाद्यान सम्पन्न हुआ।

हरियाणा, भारत के अमीर राज्यों में से एक है और प्रति व्यक्ति आय के आधार पर यह देश का दूसरा सबसे धनी राज्य है। वर्ष २०१२-१३ में देश में इसकी प्रति-व्यक्ति  १,१९,१५८ (अर्थव्यवस्था के आकार के आधार पर भारत के राज्य देखें) और वर्ष २०१३-१४ में  १,३२,०८९ रही। इसके अतिरिक्त भारत में सबसे अधिक ग्रामीण करोड़पति भी इसी राज्य में हैं हरियाणा आर्थिक रूप से दक्षिण एशिया का सबसे विकसित क्षेत्र है और यहाँ कृषि एवं विनिर्माण उद्योग ने १९७० के दशक से निरंतर वृद्धि का प्राप्त की है। भारत में हरियाणा यात्रि कारों, द्विचक्र वाहनों और ट्रैक्टरों के निर्माण में सर्वोपरी राज्य है।  भारतमें प्रति व्यक्ति निवेश के आधार पर वर्ष २००० से राज्य सर्वोपरी स्थान पर रहा है।

हरियाणा संस्कृत शब्द हरी और आयन से मिलकर बना है , जिसमे हरी शब्द भगवान विष्णु का सूचक है और आयन का अर्थ होता है घर , इस प्रकार से हरियाणा भगवान के घर से लिया गया है यहीं पर महाभारत का महान युद्ध लड़ा गया था , जिसमे विष्णु अवतार भगवान श्री कृष्ण ने गीता का उपदेश कुरुक्षेत्र की भूमि पर दिया था | हालाँकि कुछ विद्वान जैसे मुनि लाल ,मुरली चंद शर्मा ,HA फडके ,सुखदेव सिंह आदि का मानना है कि हरी शब्द यहाँ कि हरियाली का प्रतीक है और आयन का अर्थ होता है जंगल जो कि हरियाणा के नाम को सार्थक करता है


संपादित करें

सिंधु घाटी जितनी पुरानी कई सभ्यताओं के अवशेष सरस्वती नदी के किनारे पाए गए हैं। जिनमे नौरंगाबाद और मिट्टाथल भिवानी में, कुणाल, फतेहाबाद मे, अग्रोहा और राखीगढी़ हिसार में, रूखी रोहतक में और बनवाली Fatehabad जिले में प्रमुख है। प्राचीन वैदिक सभ्यता भी सरस्वती नदी के तट के आस पास फली फूली। ऋग्वेद के मंत्रों की रचना भी यहीं हुई है।


संपादित क

कुछ प्राचीन हिंदू ग्रंथों के अनुसार, कुरुक्षेत्र की सीमायें, मोटे तौर पर हरियाणा राज्य की सीमायें हैं। तैत्रीय अरण्यक ५.१.१ के अनुसार, कुरुक्षेत्र क्षेत्र, तुर्घना (श्रुघना / सुघ सरहिन्द, पंजाब में) के दक्षिण में, खांडव (दिल्ली और मेवात क्षेत्र) के उत्तर में, मारू (रेगिस्तान) के पूर्व में और पारिन के पश्चिम में है। भारत के महाकाव्य महाभारतमे हरियाणा का उल्लेख बहुधान्यकऔर बहुधनके रूप में किया गया है। महाभारत में वर्णित हरियाणा के कुछ स्थान आज के आधुनिक शहरों जैसे, प्रिथुदक (पेहोवा), तिलप्रस्थ (तिल्पुट), पानप्रस्थ (पानीपत) और सोनप्रस्थ (सोनीपत) में विकसित हो गये हैं। गुड़गाँव का अर्थ गुरु के ग्राम यानि गुरु द्रोणाचार्य के गाँव से है। कौरवों और पांडवों के बीच हुआ महाभारत का प्रसिद्ध युद्ध कुरुक्षेत्र नगर के निकट हुआ था। कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश यहीं पर दिया था। इसके बाद अठारह दिन तक हस्तिनापुर के सिंहासन का अधिकारी तय करने के लिये कुरुक्षेत्र के मैदानी इलाकों में पूरे भारत से आयी सेनाओं के मध्य भीषण संघर्ष हुआ। जनश्रुति के अनुसार महाराजा अग्रसेन् ने अग्रोहा जो आज के हिसार के निकट स्थित है, में एक व्यापारियों के समृद्ध नगर की स्थापना की थी। किवंदती है कि जो भी व्यक्ति यहाँ बसना चाहता था उसे एक ईंट और रुपया शहर के सभी एक लाख नागरिकों द्वारा दिया जाता था, इससे उस व्यक्ति के पास घर बनाने के लिये पर्याप्त ईंटें और व्यापार शुरू करने के लिए पर्याप्त धन होता था।


संपादित करें

हूण के शासन के पश्चात हर्षवर्धन द्वारा 7वीं शताब्दी में स्थापित राज्य की राजधानी कुरुक्षेत्र के पास थानेसर में बसायी। उसकी मौत के बाद गुर्जर प्रतिहार ने वहां शासन करना आरंभ कर दिया और अपनी राजधानी कन्नौज बना ली। यह स्थान दिल्ली के शासक के लिये महत्वपूर्ण था। पृथ्वीराज चौहान ने १२वीं शताब्दी में अपना किला हाँसी और तरावड़ी (पुराना नाम तराईन) में स्थापित कर लिया।मुहम्मद गौरी ने दुसरी तराईन युध में इस पर कब्जा कर लिया। उसके पश्चात दिल्ली सल्तनत ने कई सदी तक यहाँ शासन किया।

विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा दिल्ली पर अधिकार के लिए अधिकतर युद्ध हरियाणा की धरती पर ही लड़े गए। तरावड़ी के युद्ध के अतिरिक्त पानीपत के मैदान में भी तीन युद्ध एसे लड़े गए जिन्होंने भारत के इतिहास की दिशा ही बदल दी। ब्रिटिश राज से मुक्ति पाने के आन्दोलनों में हरियाणा वासियों ने भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। रेवाड़ी के राजा राव तुला राम का नाम १८५७ के संग्राम में योगदान दिया।


संपादित करें

एक राज्य के रूप में हरियाणा १ नवंबर १९६६ को पंजाब पुनर्गठन अधिनियम (१९६६) के माध्यम से अस्तित्व में आया था। भारत सरकार ने २३ अप्रैल १९६६ को पंजाब के तत्कालीन राज्य को निवासियों द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं के आधार पर विभाजित करने के विचार के बाद हरियाणा के नए राज्य की सीमा निर्धारित करने के लिए न्यायमूर्ति जेसी शाह की अध्यक्षता में शाह आयोग की स्थापना की। आयोग ने ३१ मई १९६६ को अपनी रिपोर्ट दे दी, जिससे हिसार, महेंद्रगढ़, गुड़गांव, रोहतक और करनाल के तत्कालीन जिलों हरियाणा के नए राज्य का हिस्सा बन गए। इसके अलावा, संगरूर जिले की जिंद और नरवाना तहसील, और साथ साथ ही नारायणगढ़, अंबाला और जगधरी को भी इसमें शामिल किया जाना था।

आयोग ने यह भी सिफारिश की थी कि खारद तहसील, जिसमें पंजाब की राजधानी चंडीगढ़ शामिल थी, को हरियाणा का हिस्सा होना चाहिए। हालांकि, हरियाणा को खड़द का केवल एक छोटा सा हिस्सा दिया गया था। चंडीगढ़ शहर को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था, जो कालांतर में पंजाब और हरियाणा दोनों की राजधानी बना।

हरियाणा दिवस पर जन हितकारी संगठन की हार्दिक शुभकामनाएं

Saturday, October 24, 2020

दशहरा अथवा विजयादशमी



दशहरा अथवा विजयादशमी हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। अश्विन (क्वार) मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को इसका आयोजन होता है। भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था तथा देवी दुर्गा ने नौ रात्रि एवं दस दिन के युद्ध के उपरान्त महिषासुर पर विजय प्राप्त किया था। इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। इसीलिये इस दशमी को 'विजयादशमी' के नाम से जाना जाता है (दशहरा = दशहोरा = दसवीं तिथि)। दशहरा वर्ष की तीन अत्यन्त शुभ तिथियों में से एक है, अन्य दो हैं चैत्र शुक्ल की एवं कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा

इस दिन लोग शस्त्र-पूजा करते हैं और नया कार्य प्रारम्भ करते हैं (जैसे अक्षर लेखन का आरम्भ, नया उद्योग आरम्भ, बीज बोना आदि)। ऐसा विश्वास है कि इस दिन जो कार्य आरम्भ किया जाता है उसमें विजय मिलती है। प्राचीन काल में राजा लोग इस दिन विजय की प्रार्थना कर रण-यात्रा के लिए प्रस्थान करते थे। इस दिन जगह-जगह मेले लगते हैं। रामलीला का आयोजन होता है। रावण का विशाल पुतला बनाकर उसे जलाया जाता है। दशहरा अथवा विजयदशमी भगवान राम की विजय के रूप में मनाया जाए अथवा दुर्गा पूजा के रूप में, दोनों ही रूपों में यह शक्ति-पूजा का पर्व है, शस्त्र पूजन की तिथि है। हर्ष और उल्लास तथा विजय का पर्व है। भारतीय संस्कृति वीरता की पूजक है, शौर्य की उपासक है। व्यक्ति और समाज के रक्त में वीरता प्रकट हो इसलिए दशहरे का उत्सव रखा गया है। दशहरा का पर्व दस प्रकार के पापों- काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी के परित्याग की सद्प्रेरणा प्रदान करता है।

दशहरे का सांस्कृतिक पहलू भी है। भारत कृषि प्रधान देश है। जब किसान अपने खेत में सुनहरी फसल उगाकर अनाज रूपी संपत्ति घर लाता है तो उसके उल्लास और उमंग का पारावार नहीं रहता। इस प्रसन्नता के अवसर पर वह भगवान की कृपा को मानता है और उसे प्रकट करने के लिए वह उसका पूजन करता है। समस्त भारतवर्ष में यह पर्व विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इस अवसर पर 'सिलंगण' के नाम से सामाजिक महोत्सव के रूप में भी इसको मनाया जाता है। सायंकाल के समय पर सभी ग्रामवासी सुंदर-सुंदर नव वस्त्रों से सुसज्जित होकर गाँव की सीमा पार कर शमी वृक्ष के पत्तों के रूप में 'स्वर्ण' लूटकर अपने ग्राम में वापस आते हैं। फिर उस स्वर्ण का परस्पर आदान-प्रदान किया जाता है।

दशहरा अथवा विजयादशमी पर्व की जन हितकारी संगठन की तरफ से हार्दिक शुभकामनाएं।

जय भारत


Monday, September 14, 2020

हिंदी दिवस

 


हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

आज सोशल मीडिया पर देखा कि बहुत लोग हिन्दी हिन्दी खेल रहे हैं! हमारे समझ में नहीं आता कि आखिर कैसे लोग भाषाओं के प्रति भी इस प्रकार दुराग्रह रख सकते हैं जोकि केवल संवाद का माध्यम मात्र हैं। केवल अपनी भावनाओं को दूसरे तक संप्रेषित करने का एक साधन! इससे अधिक भाषाओं की कोई उपयोगिता हमे समझ नहीं आती! परन्तु जिन्हें समस्या खड़ी करनी है वो इसके साथ भी मेरी और तेरी और ऊपर से गर्व भी जोड़कर ऐसा मसाला प्रस्तुत करेंगे कि एक मासूम सी भाषा भी नफरत की चाट बन जाए। हिन्दी वाले अंग्रेजी को पसन्द नहीं करते और दक्षिण वाले हिन्दी से नफरत करते हैं। भले ही लिपि एक ही हो परन्तु मराठियों की सारी अस्मिता उनकी भाषा से जुड़ी है। माफ़ करना थोड़े कड़े शब्द हैं परन्तु हम भी अपने स्वभाव के अनुसार सत्य कहने को मजबूर है कि इन भाषा प्रेमियों ने वाकई भाषाई नफरत को पाला-पोसा है!

भाषा के प्रति कट्टरता की हद तक शुद्धता का आग्रह हमे वस्तुतः दुराग्रह नजर आता है। इस भाषाई शुद्धता और जातिय शुद्धता (रक्त शुद्धि) में हमे कोई अन्तर नजर नहीं आता। और इस प्रकार का दुराग्रह भी जातिय अथवा भाषाई नफरत ही पैदा करता है। यूरोपियन देशों में सबकी अपनी-अपनी मातृभाषा है और वहाँ उच्च शिक्षा भी इनकी मातृभाषा में ही होती है। हम हिन्दी में मेडिकल, इंजीनियरिंग और विज्ञान क्यों नहीं पढ़ाते? क्यों नहीं हिन्दी में इतना काम किया हमने? केवल अंग्रेजी को कोसने से क्या होगा! निश्चित ही कोई भी किसी भाषा के जानने अथवा न जानने से बुद्धिमान या मूर्ख नहीं होता फिर केवल अपनी भाषा की शुद्धता के प्रति हमारी कट्टरता क्यों होती है?भाषा को भी धर्म (सम्प्रदाय) की तरह बनाकर बाँट दिया हमने इन्सान को! याद रखिये इसमें नुक्सान हमारा है और हमारी भाषा का।

वहाँ यूरोप में जर्मनी, फ़्रांस, स्पेन, डेनमार्क, स्वीडन, इटली, पुर्तगाल आदि छोटे-छोटे देश हैं, सबकी अपनी अपनी भाषा है परन्तु किसी को किसी की भाषा से कोई समस्या नहीं, कोई नफरत नहीं! बल्कि स्कूल के स्तर पर ही विद्यार्थी एक से अधिक भाषाएं सीखने और बोलने का प्रयास करते हैं और अपनी मातृभाषा को बोलकर नहीं बल्कि अन्य भाषाओं को बोलकर गर्व का अनुभव करते हैं। अपने देश भारत के सन्दर्भ में इस समस्या को देखा जाए तो हम बहुत धन्यवाद देते है अंग्रेजी का कि यदि हम दक्षिण भारत जाए तो कम से कम अंग्रेजी में संवाद तो कर सकते है। नहीं तो अपने ही देश में हम एक दूसरे की भाषा नहीं समझते। अब क्या हम तमिल, तेलगु या कन्नड़ भाषी को जबरदस्ती हिन्दी सिखायेंगे कि हिन्दी तो राष्ट्रभाषा (माना गया है वास्तविकता में भारत की अभी तक कोई भी राष्ट्रभाषा नही है) है क्योंकि वो सबसे बड़े हिस्से में बोली जाती है। ठीक यही बात हिन्दी वालों पर अंग्रेजी लादने वालों के लिए भी कही जा सकती है परन्तु उसके पहले यह बताइये कि क्या हमने आधुनिक शिक्षा को हिन्दी में विकसित किया? क्या हमारे देश में मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई हिन्दी में होती है? परन्तु वहाँ यूरोप जर्मनी, फ़्रांस, स्पेन इत्यादि में उच्च शिक्षा भी वहाँ की मातृभाषा में होती है।

जब हमने अपनी भाषा को आधुनिक समय के साथ इतना विकसित नहीं किया तो फिर क्यों दोष देते हैं और नफरत के बीज बोते हैं भाषाई दुराग्रह को पालकर। आखिर क्यों नहीं कोई गरीब भी अंग्रेजी पढ़कर समय के साथ चलने और स्वयं का विकास करने का सपना देखे। यही बात संस्कृत के लिए भी हम कह सकते है। बल्कि किसी समय में संस्कृत के प्रति भी लोगों का ऐसा नजरिया था जैसा कि आज हिन्दी के प्रति बहुत से लोगों का है। बहुत हाय तौबा मचाते होंगे उस समय वो लोग कि संस्कृत को छोड़कर अब लोग हिन्दी का प्रयोग करते हैं, बड़ी शर्म आती होगी उन्हें। संस्कृत तो बीत ली और आज की स्थिति यह है कि हिन्दी भी कविताओं, कहानियों और आम बोल-चाल की भाषा रह गई है। बताइये किस स्तर पर विज्ञान की पढाई हिन्दी में होती है! और हिन्दी में पढ़ाई करने बाद किस स्तर पर भविष्य के दरवाजे खुले मिलते हैं?

पता नहीं क्यों भाषा प्रेमी इसे अस्मिता, गर्व का विषय बनाकर भाषाई नफरत के बीज बो रहे हैं। अरे सच्चाई को स्वीकार करें या तो अपनी भाषा को उस काबिल बनायें और नहीं तो खुद को और अपने बच्चों को उस काबिल बनायें कि तरक्की के रास्ते उनके लिए खुले रहें। ऐसे भाषा प्रेम को चाटेंगे क्या जिससे कि दो वक्त की रोटी भी सुख से न मिले। हम भी हिन्दी को प्रेम करते है परन्तु अंग्रेजी का दिया खाते है और हम ऐसे अकेले ही नहीं है, बहुत सारे लोग यह बात अपने विषय में कह सकते हैं। और हां हिन्दी की पैरवी करने वाले बहुत से उन लोगों को भी हम जानते है जो हिन्दी भाषा के लिए भाषण तो बहुत बढ़िया देते हैं परन्तु अपने बच्चों को शिक्षा महंगे अंग्रेजी स्कूलों में ही दिलाते हैं।

हम हिन्द में जन्मे है, हिंदी हमारी मात्र भाषा है इसलिए हिंदी को ही प्राथमिकता देते है। इसकी वजह भी है। दरअसल हमारी सोच का माध्यम हिंदी है। हमारी खुशी, गुस्सा और सपने सभी हिंदी में ही होते हैं। लेकिन जहां अंग्रेजी में बोलने, पढ़ने व लिखने की जरुरत होती है वहां हम अंग्रेजी का ही प्रयोग करते है इसलिए हमारे लिए भाषा केवल संवाद का माध्यम है न कि कोई गर्व का विषय। यह संयोग है कि हिन्दी हमारी मातृभाषा है और यदि हम कहीं और पैदा हुए होते तो हमारी भाषा कोई और होती। हमारे पैदा होने पर हमारा कोई वश नहीं था वह मात्र एक संयोग था और माफ़ कीजियेगा हम जाति, भाषा इत्यादि के संयोंगो पर गर्व नहीं करते। भाषा, जाति यह सभी संयोग मात्र हैं और गर्व का विषय नहीं हैं। गर्व उपलब्धियों पर करना चाहिए न कि संयोगों पर। हमे भी अपनी भाषा से प्रेम है जोकि स्वाभाविक है परन्तु हम ऐसे भाषा प्रेमी नहीं कि उसके प्रति दुराग्रह हो।

जय भारत

Wednesday, September 9, 2020

महान क्रांतिकारी लाला जगत नारायण जी


महान क्रांतिकारी लाला जगत नारायण जी🙏🙏

बलिदान दिवस: 9 सितंबर, 1981💐💐

लाला जगत नारायण एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक आंदोलन का नाम था जो 31 मई 1899 से प्रारम्भ होकर 9 सितम्बर 1981 तक जारी रहा। लाला जगत नारायण का जीवन देश तथा समाज को समर्पित रहा। उन्होंने अंतिम सांस तक देश की एकता और अखंडता के लिए काम किया और उसी के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया। 

हिन्द समाचार पत्र समूह के संस्थापक लाला जगत नारायण जी का जन्म जिला गुजरांवाला (पाकिस्तान) के वजीराबाद में 31 मई 1899 को हुआ। उन्होंने डी.ए.वी. कालेज लाहौर से सन् 1919 में स्नातक की शिक्षा पूरी करने के बाद लॉ कालेज लाहौर में दाखिला ले लिया लेकिन सन् 1920 में जब गांधी ने असहयोग आंदोलन के लिए देश के नौजवानों को ललकारा तो लाला जी अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ कर देश की स्वतंत्रता के लिए चलाए गए इस आंदोलन में कूद पड़े। उन्हें अढ़ाई वर्ष जेल की सजा सुनाई गई। अपने जेल प्रवास के दौरान वह लाला लाजपत राय जी के निजी सचिव के रूप में काम करते रहे। लाला जी लगभग 9 साल जेल में रहे और इनकी पत्नी को भी 8 माह जेल में बिताने पड़े थे।आज़ादी के बाद ये लाहोर से जालंधर आकर बस गए ।1965 में हिंदी दैनिक अख़बार पंजाब केसरी की शुरुआत की जो आज भारत का एक प्रमुख दैनिक है।

लाला जी आर्य समाज के पक्के अनुयायी थे। वह एक सुलझे हुए पत्रकार एवं सच्चे राष्ट्र भक्त थे। उन्होंने कभी भी अपने उसूलों के साथ समझौता नहीं किया। जब पंजाब में आतंकवाद रूपी नाग अपना फन उठा रहा था तो उन्होंने अपने अखबारों में जमकर इसके विरोध में लिखा और उनको इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। 9 सितम्बर 1981 को पटियाला से जालंधर आते समय आतंकियों ने इनकी गोली मारकर हत्या कर दी।

महान क्रांतिकारी लाला जगत नारायण जी के बलिदान दिवस पर जन हितकारी संगठन उन्हें शत शत नमन करता है 💐🙏💐🙏

जय भारत🇮🇳

महान क्रांतिकारी चित्तप्रिय राय चौधरी जी


महान क्रांतिकारी चित्तप्रिय राय चौधरी जी
🙏

बलिदान दिवस: 9 सितंबर 1915

ये क्रांतिवीर बाघा जतिन जी के दल के सदस्य थे। 9 सितंबर 1915 को पुलिस ने जतिन का गुप्त अड्डा 'काली पोक्ष' (कप्तिपोद) ढूंढ़ निकाला। यतीजतिन बाबू साथियों के साथ वह जगह छोड़ने ही वाले थे कि राज महन्ती नमक अफसर ने गाँव के लोगों की मदद से उन्हें पकड़ने की कोशश की। बढ़ती भीड़ को तितरबितर करने के लिए जतिन ने गोली चला दी। राज महन्ती वहीं ढेर हो गया। यह समाचार बालासोर के जिला मजिस्ट्रेट किल्वी तक पहुंचा दिया गया। किल्वी दल बल सहित वहाँ आ पहुंचा। यतीश नामक एक क्रांतिकारी बीमार था। जतिन उसे अकेला छोड़कर जाने को तैयार नहीं थे। चित्तप्रिय भी उनके साथ था। दोनों तरफ़ से गोलियाँ चली।ये सिर्फ 5 लोग थे और दूसरी तरफ भारी पुलिस बल आधुनिक हथियारों के साथ।इनके पास केवल पिस्तौल और गिनती के कारतूस थे। इस लड़ाई में चित्तप्रिय वहीं शहीद हो गए। 

चित्तप्रिय जी के बलिदान दिवस पर जन हितकारी संगठन उन्हे शत शत नमन करता है💐💐💐🙏🙏

जय भारत 🇮🇳

Friday, September 4, 2020

शिक्षक दिवस (Teacher's day)


शिक्षक दिवस (Teacher's day)

गुरु-शिष्य परंपरा भारत की संस्कृति का एक अहम और पवित्र हिस्सा है। जीवन में माता-पिता का स्थान कभी कोई नहीं ले सकता, क्योंकि वे ही हमें इस रंगीन खूबसूरत दुनिया में लाते हैं। कहा जाता है कि जीवन के सबसे पहले गुरु हमारे माता-पिता होते हैं। भारत में प्राचीन समय से ही गुरु व शिक्षक परंपरा चली आ रही है, लेकिन जीने का असली सलीका हमें शिक्षक ही सिखाते हैं। सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं।

प्रतिवर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म-दिवस के अवसर पर शिक्षकों के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए भारतभर में शिक्षक दिवस 5 सितंबर को मनाया जाता है। 'गुरु' का हर किसी के जीवन में बहुत महत्व होता है। समाज में भी उनका अपना एक विशिष्ट स्थान होता है। सर्वपल्ली राधाकृष्णन शिक्षा में बहुत विश्वास रखते थे। वे एक महान दार्शनिक और शिक्षक थे। उन्हें अध्यापन से गहरा प्रेम था। एक आदर्श शिक्षक के सभी गुण उनमें विद्यमान थे। इस दिन समस्त देश में भारत सरकार द्वारा श्रेष्ठ शिक्षकों को पुरस्कार भी प्रदान किया जाता है।

इस दिन स्कूलों में पढ़ाई बंद रहती है। स्कूलों में उत्सव, धन्यवाद और स्मरण की गतिविधियां होती हैं। बच्चे व शिक्षक दोनों ही सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेते हैं। स्कूल-कॉलेज सहित अलग-अलग संस्थाओं में शिक्षक दिवस पर विविध कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। छात्र विभिन्न तरह से अपने गुरुओं का सम्मान करते हैं, तो वहीं शिक्षक गुरु-शिष्य परंपरा को कायम रखने का संकल्प लेते हैं। 

स्कूल और कॉलेज में पूरे दिन उत्सव-सा माहौल रहता है। दिनभर रंगारंग कार्यक्रम और सम्मान का दौर चलता है। इस दिन डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को उनकी जयंती पर याद कर मनाया जाता है। 

गुरु-शिष्य परंपरा भारत की संस्कृति का एक अहम और पवित्र हिस्सा है जिसके कई स्वर्णिम उदाहरण इतिहास में दर्ज हैं। शिक्षक उस माली के समान है, जो एक बगीचे को अलग अलग रूप-रंग के फूलों से सजाता है।

जो छात्रों को कांटों पर भी मुस्कुराकर चलने के लिए प्रेरित करता है। आज शिक्षा को हर घर तक पहुंचाने के लिए तमाम सरकारी प्रयास किए जा रहे हैं। शिक्षकों को भी वह सम्मान मिलना चाहिए जिसके वे हकदार हैं। एक गुरु ही शिष्य में अच्छे चरित्र का निर्माण करता है।

आज तमाम शिक्षक अपने ज्ञान की बोली लगाने लगे हैं। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें तो गुरु-शिष्य की परंपरा कहीं न कहीं कलंकित हो रही है। आए दिन शिक्षकों द्वारा विद्यार्थियों एवं विद्यार्थियों द्वारा शिक्षकों के साथ दुर्व्यवहार की खबरें सुनने को मिलती हैं। इसे देखकर हमारी संस्कृति की इस अमूल्य गुरु-शिष्य परंपरा पर प्रश्नचिह्न नजर आने लगता है। विद्यार्थियों और शिक्षकों दोनों का ही दायित्व है कि वे इस महान परंपरा को बेहतर ढंग से समझें और एक अच्छे समाज के निर्माण में अपना सहयोग प्रदान करें। 

शिक्षक दिवस पर जन हितकारी संगठन की तरफ से सभी देश वासियों को हार्दिक शुभकामनाएं🙏🙏

जय भारत🇮🇳

मकर संक्रांति (त्यौहार एक नाम अनेक)

  मकर संक्रांति एक ऐसा त्यौहार है, जिसे देश के हर कोने में मनाया जाता है। कहीं पर लोहड़ी तो कहीं इसे खिचड़ी के नाम से जाना जाता है। कई नामों व...